द्वितीय महायुद्ध की प्रमुख घटनाएं का संक्षिप्त विवरण दीजिये ?

द्वितीय महायुद्ध की प्रमुख घटनाएं का संक्षिप्त विवरण दीजिये ?

4. निशस्त्रीकरण के प्रयासों की असफलता –

विश्व राजनीतिज्ञों का यह मानना था इटली, जर्मनी तथा जापान में उग्र राष्ट्रवाद का प्रभाव प्रबल था। वहाँ राष्ट्रवाद का लक्ष्य राष्ट्रका शक्ति एवं गौरव के लिए आर्थिक साधनों पर राज्य का पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करके आक्रामक नीतियों का आश्रय लिया जाने लगा । हिटलर ने ‘सर्वश्रेष्ठ प्रजाति (Master Race) की भावना को राष्ट्र की महानता का आधार बनाया और वसाय की अन्यायपूर्ण सन्धि द्वारा किये गये राष्ट्रीय अपमान का प्रतिशोध लेने की इच्छा को उत्तेजित किया । राष्ट्रीयता की भावना को उत्तेजित करने में आर्थिक मन्दी ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । वास्तव में आर्थिक संकट ने विश्व की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

(7) अल्पसंख्यक जातियों का असन्तोष –

जहाँ पेरिस की सन्धियों द्वारा सीमाओं में परिवर्तन किया गया वहाँ जातियों का अदल बदल होना भी स्वाभाविक था। इससे बाल्कन प्रायद्वीप और मध्य यूरोप में बड़ी जटिल स्थिति उत्पन्न हो गयी। जहाँ आस्ट्रिया को जर्मनी से अलग किया गया जहाँ चेकोस्लोवाकिया को स्वतन्त्र राज्य मान लिया गया, वहाँ विभिन्न जातियों को एक ही राज्य में रहने को बाध्य होना स्वाभाविक था। ऐसी कई जातियां अल्पसंख्या में विविध राज्यों में बिखरी हुई थी | सन्धियों के निर्माण के समय मित्रराष्ट्रों ने ‘आत्म निर्णय का सिद्धान्त स्वीकार करके अल्पसंख्यकों को भय से विमुक्त कर दिया था और उनकी आर्थिक आवश्यकताएं, सैनिक सुरक्षा तथा सामाजिक, धार्मिक और नीतिक अधिकारों की मान्यताओं पर पूरा ध्यान दिया गया था। किन्तु ये अल्पसंख्यक पारस्परिक विरोध, उत्तेजना और असन्तोष उत्पन्न करने के साधन बन गये । हिटलर ने इसी कारण पोलैण्ड का विभाजन कर दिया था। आस्ट्रिया तथा चेकोस्लोवाकिया में, जो जर्मन जाति थी, वह अपने को विदेशी शासन के अधीन मानती थी । हिटलर ने उनके असन्तोष का पूरा लाभ उठाया । उसने आस्ट्रिया और सुबेटनलैण्ड में अल्पसंख्यकों पर कुशासन का बहाना बनाकर इनका अपहरण कर लिया तत्पश्चात् उसने पोलैण्ड पर आक्रमण किया । इस प्रकार ये अल्पसंख्यक जातियां भी विभित्र देशों के आपसी संघर्ष का कारण बनी।

(8) युद्ध का तात्कालिक कारण : पोलैंड पर आक्रमण-

उपरोक्त कारणों से अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर बारूद का महल खड़ा हो चुका था। अब केवल एक चिन्गारी लगाने की देर थी। यह कार्य हिटलर ने पोसण्ड पर आक्रमण करके सम्मान कर दिया 11 सितम्बर, 1939 को हिटलर ने पोलैण्ड पर अचानक आक्रमण कर दिया । 3 सितम्बर को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को युद्ध बन्द करने की चेतावनी दी किन्तु हिटलर ने इस चेतावनी की उपेक्षा की । फलस्वरूप ब्रिटेन तथा फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी | कुछ ही समय में युद्ध ने विस्तृत रूप धारण कर लिया । यही द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत थी।

द्वितीय महायुद्ध की घटनाएं महायुद्ध की घटनाओं को सुविधा की दृष्टि से हम चार भागों में बाट सकते है :

1. प्रथम अवस्था- इसमें 1 सितम्बर, 1939 से 21 जून, 1941 तक की घटनाएँ, जिसमें जर्मनी ने पोलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, लेक्जेम्बर्ग, फ्रांस, ब्रिटेन तथा यूनान पर आक्रमण किये।

2. द्वितीय अवस्था- 22 जून, 1941 से 6 दिसम्बर, 1941 तक धुरी राष्ट्रों द्वारा अफ्रीका पर आक्रमण तथा जर्मनी का रूस पर आक्रमण ।

3. तृतीय अवस्था- 7 दिसम्बर, 1941 से 7 नवम्बर,1942 तक | इसमें जापान का पर्लहारबर पर आक्रमण तथा मित्र राष्ट्रों के सैन्य बल का नीदरलैण्ड, ईस्ट इण्डीज तथा काकेशस पर अधिकार।

4. चतुर्थ अवस्या-8 नवम्बर, 1942 से 6 मई, 1945 तक इसमें फ्रैंच उत्तरी अफ्रीका पर अमेरिका का आक्रमण तथा जर्मनी का आत्मसमर्पण साथ ही 7 मई, 1945 से 14 अगस्त, 1945 तक जापान का आत्मसमर्पण।

पोलैण्ड पर आक्रमण और महायुद्ध का आरंभ-

1 सितम्बर, 1939 को प्रातः चार बजे जब सारा यूरोप अभी सोया हुआ था, हिटलर की सेना पोलैण्ड की सीमा पार कर गयी । बिजली की चमक की तरह विशाल जर्मन सेना पोलैण्ड पर टूट पड़ी । एक तरफ से जर्मन हवाईजहाजों (Luftwaffe) ने पोलैण्ड पर गोलाबारी करके उसके यातायात के साधनों और बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों को नष्ट कर दिया, वही हवाई हमले के साथ-साथ जर्मन सेना वेहरमक्ट (Wehrmacht) पोलैण्ड को रौदती हुई आगे बढ़ने लगी। पोलिश सेना को उसका मुकाबला करने का मौका ही नहीं मिला। “तडित युद्ध प्रणाली” (Blitz Krieg) का प्रयोग करके जर्मन सेनाओं ने दो सप्ताह के भीतर पोलैण्ड के पश्चिमी प्रदेश पर अधिकार कर लिया और उसकी राजधानी वारसा को घेर लिया गया ।

इसी बीच, 3 सितम्बर को ब्रिटेन तथा फ्रांस ने अपने वायदे के मुताबिक जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की । ब्रिटिश युद्ध घोषणा के बाद कामनवेल्थ के राज्यों, (आस्ट्रिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिणी अफ्रीका, कनाडा तथा भारत) ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया । जर्मन हवाई हमलों के कारण ब्रिटेन और फ्रांस वायु मार्ग से पोलैण्ड को सैनिक सहायता नहीं भेज सके। रूस भी इस युद्ध को अधिक दिनों तक दूर से नहीं देख सकता था । सम्पूर्ण पोलैण्ड पर जर्मन अधिकार हो जाने से जर्मनी और सोवियत रूस की सीमाएं मिल जाती थी, इससे रूस की सुरक्षा को खतरा था। अतः 17 सितम्बर को सोवियत रूस ने पोलैश पर आक्रमण करके उसके पूर्वी क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया। 27 सितम्बर को सम्पूर्ण पोलैण्ड पर विदेशी अधिकार हो गया। 28 सितम्बर को जर्मनी तथा सोवियत रूस के बीच एक समझौता हुआ जिसके अनुसार पोलैण्ड का पश्चिमी भाग जर्मनी को प्राप्त हुआ और पूर्वी पोलैण्ड रूस को प्राप्त हुना। पोलैण्ड के विभाजन के फलस्वरूप जर्मनी को उसका अधिकांश उद्योग एवं खनिज प्रधान भाग प्राप्त हो गया और रूस को उसका कृषि प्रधान एवं प्राकृतिक तेल का क्षेत्र प्राप्त हो गया।

रूस का बाल्टिक राज्यों पर अधिकार तथा फिनलैण्ड पर रूस का आक्रमण –

रूस-जर्मन समझौते के पश्चात्, जर्मनी पश्चिमी मोर्च पर ब्रिटेन तथा फ्रांस के साथ युद्ध में व्यस्त हो गया। इस अवसर का लाभ उठाकर सोवियत संघ ने बाल्टिक क्षेत्र के तीन छोटे राज्यों -स्टोनिया, लेटविया एवं लिथुआनिया के साथ परस्पर सहयोग सम्बन्धी सन्धि कर ली और तीनों राज्यों में अपनी सेनाएँ रखने का आश्वासन ले लिया । इतने से ही सोवियत रूस सन्तुष्ट नहीं था, वे लेनिनग्राड की रक्षा के लिए फिनलैण्ड में भी सैनिक अड्डा स्थापित करने की सुविधाएं चाहते थे। इसी उद्देश्य से अक्टूबर, 1939 में सोवियत सरकार ने फिनलैण्ड के प्रतिनिधियों से वार्ता में कुछ मांगे रखी, जिनमें हांगो बन्दरगाह को पड़े पर देने, फिनलैण्ड की खाड़ी के कुछ द्वीपों पर अधिकार आदि प्रमुख थी।

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