भारतीय मत के अनुसार शिक्षा के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए

भारतीय मत के अनुसार शिक्षा के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए

फ्रॉबेल (Froebel) – “शिक्षा प्रक्रिया द्वारा बालक की जन्मजात क्षमताओं की अभिव्यक्ति में सहायता मिलती है ।” (Education is the process by which the child make its internal, external.)

टी. रेमाण्ट (T. Reymant) – “शिक्षा विकास की वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य शैशवकाल से प्रौढ़ काल तक विकास करता है और जिसके द्वारा वह धीरे-धीरे अपने को अनेक प्रकार से अपने प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पर्यावरण के अनुकूल बनाता है ।” (Education is the process of development which consists the passage of a human being from infancy to maturity the process by which he adapts himself gradually in various ways to his physical, social and spiritual environment.)

उपरोक्त परिभाषाओं से प्रकट होता है भारतीय मत में प्रकृतिवादी दर्शन का आदर्शवादी दृष्टिकोण से समन्वय किया गया है ।

(3) प्रयोगवादी या अर्थ क्रिया वादी दर्शन (Pragmatism)

(3) प्रयोगवादी या अर्थ क्रिया वादी दर्शन (Pragmatism) के अनुसार कुछ प्रमुख परिभाषाएँ हैं:

जॉन डीवी (John Dewey) – “शिक्षा अनुभवों के सतत् पुनर्निमाण के माध्यम से जीवन की प्रक्रिया है | यह व्यक्ति में उन समस्त क्षमताओं का विकास है जिसके दवारा वह अपने पर्यावरण को नियन्त्रित करता है तथा अपनी उपलब्धि की सम्भावनाओं को पूरी करता है।

1” (Education is the process of living through a continuous reconstruction of experiences. It is the development of all those capacities in the individual which will enable him to controls his environment and fulfil his possibilities.)

आटवे (Ottway) – “व्यक्ति की सम्पूर्ण प्रक्रिया व्यक्तियों व सामाजिक समूहों की अन्योन्य क्रिया है, जो व्यक्तियों के विकास के लिये कुछ निश्चित उद्देश्यों से की जाती है ।” (The Whole process of education is the inter action of individuals and social groups, with certain ends in view for the development of the individuals.)

भारतीय मत में इन परिभाषाओं में व्यक्त शिक्षा की जीवनोपयोगिता एवं समाज सापेक्षता का समन्वय किया गया है । इनमें शिक्षा का सम्प्रत्यय समन्वय पूर्ण एवं सन्तुलित है। शिक्षा की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है किन्तु सभी दार्शनिक विचारधाराओं के समन्वय की दृष्टि से यह कहना उपयुक्त होगा कि –

शिक्षा के उद्देश्य

“शिक्षा के उद्देश्य आदर्शवादी, साधन प्रकृतिवादी तथा वास्तविक प्रक्रिया का दृष्टिकोण प्रयोजनवादी होना चाहिए ।” (Aims of Education should be idealistic, means be naturalistic and approach to actual process be pragmatic)

स्वमूल्यांकन प्रश्न

2.पाश्चात्य मत के अनुसार शिक्षा के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए । 3.शिक्षा की प्रकृति को स्पष्ट कीजिए ।

 शिक्षा का अर्थ

संकुचित अर्थ में शिक्षा योजनाबद्ध रूप में निर्धारित कर दी जाती है । ऐसी शिक्षा का रूप औपचारिक होता है अर्थात वह एक निश्चित स्थान पर विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में दी जाती है तथा उसकी एक निश्चित अवधि, निश्चित पाठ्यक्रम तथा निश्चित योग्यता वाले शिक्षक होते हैं । इस संकुचित अर्थ में शिक्षा विद्यालय में बालक के प्रवेश होने से प्रारम्भ होता है तथा शिक्षा संस्था को छोड़ने पर उसकी समाप्ति मानी जाती है ।

टी. रेमंट (T. Raymont) के शब्दों में – “शिक्षा से हम उन विशेष प्रभावों को समझते हैं जिनको समाज का वयस्क वर्ग जान बूझकर निश्चित योजना द्वारा अपने से छोटों तथा तरूण वर्ग पर डालता है ।”

मिल के शब्दों में – “शिक्षा द्वारा एक पीढ़ी के लोग दूसरी पीढ़ी के लोगों में संस्कृति का संक्रमण करते हैं ताकि वे उसका संरक्षण कर सकें और यदि संभव हो तो उसमें उन्नति भी कर सकें ”
“The culture which each generation purposefully gives to those who are to be its successors in order to quality them for at last keeping up and if possible for raising the level of improvement which has been attained.”-John Stuarat Mill

एस. एस. मैकेन्जी (S. S. Mackenge) के अनुसार – ‘संकुचित अर्थ में किसी भी ऐसे सचेतन प्रयास को शिक्षा कहा जा सकता है जो हमारी क्षमताओं का विकास एवं वृद्धि करे I” (In Narrower sense Education may be taken to mean any consciously directed effort to develop and cultivate our powers.)

डीवर – “शिक्षा एक प्रक्रिया है, जिसमें तथा जिसके द्वारा बालक के ज्ञान, चरित्र तथा व्यवहार को एक विशेष साँचे में ढाला जाता है ।” (Education is the process in which and by which knowledge, character and behaviour of the young are shaped and moulded.)

शिक्षा का व्यापक अर्थ

व्यापक दृष्टि में शिक्षा का अर्थ बालक के उन सभी अनुभवों से है जिसका प्रभाव उसके ऊपर जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक पड़ता है । अर्थात् शिक्षा वह अनियन्त्रित वातावरण है। जिसमें रहते हुए बालक अपनी प्रकृति के अनुसार स्वतन्त्रता पूर्वक नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है तथा विकसित होता है । शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है । ऐसी शिक्षा किसी विशेष व्यक्ति, समय, स्थान अथवा देश तक सीमित नहीं रहती अपितु जिन व्यक्तियों के सम्पर्क में आकर बालक जो कुछ भी सीखता है वे सभी उसके शिक्षक हैं, जिन्हें वह सिखाता है। वे सब उसके शिष्य हैं तथा जिस स्थान पर सीखने एवं सिखाने का कार्य चलता है वह विद्यालय है । शिक्षा बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है ।

जॉन स्टुअर्ट मिल के शब्दों में – “विस्तृत या व्यापक अर्थ में शिक्षा चरित्र और मानवीय क्षमताओं पर उन बातों द्वारा पड़े हुए अप्रत्यक्ष प्रभावों का भी बोध कराती है जिनके प्रत्येक प्रयोजन नितान्त भिन्न होते हैं ।”

इमविल (Dumville) के अनुसार, “शिक्षा के व्यापक अर्थ में वे सभी प्रभाव आते हैं, जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं। (Education in its wider sense includes all the influences which act upon an individual during the passage from cradle to the grave.)

शिक्षा का समन्वित अर्थ

जॉन डीवी के अनुसार, “शिक्षा गत्यात्मक विकासोन्मुखी एवं बालक, समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होनी चाहिए ।” शिक्षा की गत्यात्मकता का अर्थ है कि शिक्षा प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति की क्षमताओं एवं गुणों की अभिव्यक्ति के अवसर देकर उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता है तथा ऐसी शिक्षा व्यक्ति को परिवर्तित सामाजिक पर्यावरण से सामन्जस्य करने योग्य बनाती है । शिक्षा प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति का इस प्रकार विकास किया जाना वांछनीय है जिसमें वह समाज एवं राष्ट्र का एक सुयोग्य नागरिक बन अपना सक्रिय योगदान कर सकें ।
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