द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों में रूसी नौसैनिक अड्डे की स्थापना का क्या महत्व है?

द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों में रूसी नौसैनिक अड्डे की स्थापना का क्या महत्व है?

फिनलैण्ड की सरकार ने हांगों में रूसी नौसैनिक अड्डे की स्थापना को छोड़कर रूस की सभी मांगों को स्वीकार करने की बात कही परन्तु रूस की सरकार अपनी सभी मांगों को पूरा करने पर दबाव डाल रही थी। इस कारण समझौता वार्ता भंग हो गयी। 29 नवम्बर, 1939 को रूस ने फिनलैण्ड पर यह आरोप लगाया कि उसके सीमान्त सैनिकों ने सोवियत सैनिकों पर गोली चलायी है । रूस ने 1932 के सोवियत-फिन समझौते को तोड़कर फिनलैण्ड पर आक्रमण कर दिया । 2 दिसम्बर, 1939 को फिनलैण्ड ने राष्ट्रसंघ से अपील की, जिसके फलस्वरूप रूस को राष्ट्रसंघ से निष्कासित कर दिया गया | जनरल मेनरहीम (Mannarheim) के नेतृत्व में छोटे से फिनलैण्ड ने जमकर शक्तिशाली सोवियत संघ का मुकाबला किया ।

नौसैनिक अड्डे की स्थापना

युद्ध के प्रारम्भिक दिनों में उसने ‘लाल सेना पर सफलता पायी किन्तु फरवरी, 1940 में सोवियत संघ ने सेना को सुसंगठित कर फिनलैण्ड पर जोरदार आक्रमण किया । फलस्वरूप 12 मार्च, 1940 को उसे आत्मसमर्पण करना पड़ा । फिनलैण्ड को एक सन्धि के अनुसार लडीगा झील सहित बहुत बड़ा भाग देना पड़ा और होगों में रूसी नौसेनिक अड्डे की स्थापना की स्वीकृति भी देनी पड़ी। इस प्रकार रूस ने उन सभी प्रदेशों पर अधिकार जमा लिया जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद उसके हाथ से निकल गये थे। जर्मनी ने रूस के इस अधिकार को स्वीकार कर लिया

डेनमार्क मीर नार्वे का पतन-

पोलैण्ड पर अधिकार करने के बाद हिटलर ने एक कूटनीतिक चाल चली । उसने इंग्लैण्ड और फ्रांस से कहा कि युद्ध बन्द कर दिया जाय क्योंकि अब उसे अन्य किसी प्रदेश को प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं है। किन्तु मित्र राष्ट्रों ने उसकी बात पर अविश्वास करके उसकी इस माँग को ठुकरा दिया । अतः जर्मनी ने अप्रेल, 1940 में रूस, नार्वे तथा डेनमार्क पर आक्रमण किया । नार्वे की सेना ने जर्मनी का मुकाबला किया किन्तु अन्त में पराजय स्वीकार करनी पड़ी । डेनमार्क भी पराजित हुआ | वह जर्मनी के संरक्षण में चला गया और वहाँ की राजधानी कोपेहेगेन पर जर्मनी का आधिपत्य हो गया । इन दोनों की पराजय के फलस्वरूप चेम्बरलेन की सरकार बदनाम हो गयी और उसे त्यागपत्र देना पड़ा । चेम्बरलेन के स्थान पर चर्चिल प्रधानमंत्री बना | वह देश को एक महान् युद्ध नेता के रूप में मिला । उसने युद्ध का कुशलतापूर्वक संचालन किया।

हॉलैग मौर बेल्जियम पर जर्मन माक्रमण (10 मई, 1940)-

10 मई, 1940 को जर्मनी ने लेक्जेम्बर्ग, बेल्जियम और हॉलैण्ड पर आक्रमण कर दिया । लेक्जेम्बर्ग पर उसी दिन अधिकार कर लिया गया | पाँच दिन बाद हॉलैण्ड पर अधिकार हो गया तथा 28 मई, 1940 को बेल्जियम ने आत्मसमर्पण कर दिया । यद्यपि बेल्जियम की सहायता के लिए ब्रिटिश सेनाएं गई पीकिन्तु वे स्वयं जर्मन सेनाओं से घिर गर्यो । ब्रिटिश सैनिक अधिकारियों ने अपने कुशल रणकौशल का परिचय देते हुए अपनी अधिकारी सेना को बचा लिया ।

फ्रांस का आत्मसमर्पण-

बेल्जियम पर आक्रमण करने का अर्थ ही यह था कि जर्मनी अब फ्रांस पर विद्युत-प्रहार करने की तैयारी कर रहा है। अतः फ्रांस ने अपने बचाव के लिए तैयारी आरम्भ कर दी । 10 मई को हिटलर ने अपने पुराने शगुफ्रांस पर आक्रमण कर दिया। 16 मई को फ्रेंच, बेल्जियम और ब्रिटिश फौजे गइल की रेखा से शेल्ट की ओर पीछे हटने लगी । 17 मई को जर्मन सेनाओं ने फ्रांसीसी रक्षा पंक्ति को तोड़कर, 60 मील के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, जिससे उत्तरी क्षेत्र में स्थित ब्रिटिश, बेल्जियम और फ्रेंच सेनामों का दक्षिण की फ्रांसीसी सेनामों से सम्बन्ध विच्छेद हो गया । फ्रांस तथा मित्र राष्ट्रों की स्थिति इस समय अत्यन्त कमजोर हो गई थी। 19 मईको फ्रांस के मन्त्रिमण्डल में कुछ महत्त्वपूर्ण परिर्वतन हुए। मार्शल पेता को उप-प्रधानमन्त्री बनाया गया और स्वयं प्रधानमन्त्री रेनों में राष्ट्रीय सुरक्षा एवं पुद मन्त्री का कार्य सम्भाला । इसी दिन जनरल गोमली के स्थान पर जनरल वेगांव (Waygand) को प्रधान सेनापति बनाया गया । गांव प्रथम विश्व पुड में मार्शल फौच के अधीन प्रधान सैनिक अधिपति (Chlot of Staff) रह चुका था, लेकिन 75 वर्ष की अवस्था में बह फ्रांस की रक्षा करने में असमर्थ था 25 मई तक बोलोन और 27 मई को कैले (Calaid) का पतन हो गया और जर्मन सेनाएँ डंकर्क (Dumkirk) के बन्दरगाह के करीब पहुंच गई। 28 मई को बेल्जियम के शासक लियोपोल्ड ने आत्मसमर्पण कर युद्ध बन्द कर दिया था। इससे मित्र राष्ट्रों की उत्तरी सेना का वामपाल, शत्रु के आक्रमण के लिए खुल गया और उनकी पराजय सुनिश्चित हो गई15 जून को जर्मन सेनाओं ने फ्रांस के विरुद्ध पुनः आक्रमण किया । जर्मन टैकों और हवाई जहाजों के हमलों के सामने फ्रांस की सेनाएँ अधिक समय तक नहीं टिक सकी । फलस्वरूप 10 जून को फ्रांस की सरकार पेरिस छोड़कर तूर (Tours) चली गयी ।

इटली का पुड में प्रवेश-

मई, 1940 के अन्त तक इटली की सैनिक तैयारी पूरी हो चुकी थी और मुसोलिनी ने हिटलर को सूचित किया कि वह जून के आरम्भ में युद्ध की घोषणा कर देगा | 10 जून को इटली ने फ्रांस तथा ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी | इस घोषणा से फ्रांस का मनोबल समाप्त प्रायः हो गया | इटली की सीमा पर लगी हुई फ्रांसीसी सेनाओं को पेरिस की रक्षा के लिए भेजना सम्भव नहीं था। 14 जून को जर्मन सेनाएँ शान्तिपूर्वक पेरिस पहुँच गयी क्योंकि फ्रांस की सरकार ने अपने सैनिकों को वहाँ से हटा लिया था। 16 जून को प्रधानमन्त्री रेनां ने त्याग पत्र दे दिया, उसके स्थान पर मार्शल पेतां प्रधानमन्त्री बना 1722 जून को फ्रांस तथा जर्मनी के बीच युद्ध विराम सन्धि हुई । युद्ध विराम की शर्तों के अनुसार फ्रांस को अपना आधे से अधिक भूभाग, जिसमें उसका अधिकांश औद्योगिक क्षेत्र तथा अटलांटिक सागर तटीय समस्त बन्दरगाह सम्मिलित थे, जर्मनी को देना पड़ा | 23 जून, 1940 को इटली के साथ भी युद्ध विराम सन्धि हुई जिसके अनुसार उसने इटली द्वारा जीता गया क्षेत्र देने तथा उसके साथ लगे हुए 31 मील लम्बे क्षेत्र, तुलो, ट्यूनिशिया, कार्सिका, अल्जीरिया में अपने प्रमुख ठिकानों को विसैन्यीकरण करने की स्वीकृति दे दी । किन्तु बहुत से फ्रांसीसी जर्मनी के विरूद्ध युद्ध जारी रखना चाहते थे । अतः जनरल डिगाल के नेतृत्व में कुछ फ्रांसीसी देशभक्त इंगलैण्ड पहुँचे तथा वहाँ आजाद फ्रांसीसी सेना और आजाद फ्रांसीसी सरकार गठित की गई । इस आजाद फ्रांसीसी सरकार ने जर्मनी के विरुद्ध अपना युद्ध जारी रखा।

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