द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन पर जर्मनी का आक्रमण का क्या महत्व है?

द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन पर जर्मनी का आक्रमण का क्या महत्व है?

मांस की पराजय से ब्रिटेन की स्थिति कमजोर हो गयी | उसके सभी सैनिक हथियार और जहाजी बेड़े जर्मनी को प्राप्त हो चुके ये। जर्मनी के पास अब नार्वे से लेकर दक्षिणी स्पेन तक समस्त समुद्री भाग आ चुका था। इससे प्रोत्साहित होकर 18 जून, 1940 को जर्मनी ने इंगलैण्ड पर भीषण आक्रमण कर दिया | पांच माह तक जर्मन हवाई जहाज इंगलैण्ड पर बम वर्षा करते रहे। अकेले लन्दन पर पचास बम गिराये गये | किन्तु चर्चिल की सरकार ने बड़े साहस से जर्मनी का मुकाबला किया तथा जर्मनी के तीन हजार से अधिक बम वर्षक विमानों को मार गिराया । 4 जून, 1940 को हाउस आफ, कामन्स में बोलते हुए चर्चिल ने कहा था- “यद्यपि यूरोप के विस्तृत क्षेत्र और अनेक प्राचीन एवं प्रतिष्ठित राज्य कुत्सित नात्सी शासन तंत्र की अधीनता में चले गये है- परन्तु हम न तो मुकेंगे और न ही असफल होंगे । हम अन्त तक संघर्ष करते रहेंगे । हम फ्रांस में लड़ेंगे, समुद्रों एवं महासागरों पर लड़ेंगे, हम बढ़ते हुए आत्मविश्वास एवं बढ़ती हुई पाक्ति से हवाई युद्ध करेंगे, अपने द्वीप की रक्षा अवश्य करेंगे, चाहे उसके लिए कितनी ही कीमत चुकानी पड़े- हम कभी भी समर्पण नहीं करेंगे

इटली का मिस्र पर आक्रमण

चर्चिल ने केवल जोशीले भाषण ही नहीं दिये, वरन् इंगलैण्ड की रक्षा के लिए हर सम्भव तैयारी की । अतः धीरे धीरे हिटलर ने अपने आक्रमणों को धीमा कर दिया | दूसरी ओर इटली ने सोमालीलैण्ड, केनिया और सूडान पर अधिकार कर लिया । इटली ने उत्तरी मिस पर भी आक्रमण किया और तत्पश्चात् यूनान पर चढ़ाई की । यूनान ने अन्य देशों की सहायता से इटालियन सेना को यूनान से बाहर निकाल दिया । इस पर जर्मनी ने इटली की सहायता की, जिससे अप्रेल, 1941 में यूनान पर जर्मनी का अधिकार हो गया । रूस भी बाल्टिक क्षेत्रों पर अधिकार करता जा रहा था । जापान भी इस अवसर का लाभ उठाकर सुदूरपूर्व में “वृहत्तर पूर्वी एशिया’ का निर्माण करना चाहता था । इसीलिये उसने जर्मनी तथा इटली से समझौता करके सितम्बर, 1941 में धुरी राष्ट्रों के साथ युद्ध में प्रवेश किया । दो माह में ही हंगरी, रुमानिया और स्लोवाकिया भी धुरी राष्ट्रों के साथ सम्मिलित हो गये | फरवरी, 1941, में जर्मन सेनाओं ने लीबिया से ब्रिटिश फौजों को खदेड दिया। 9 अप्रैल, 1941 को यूगोस्लाविया पर आक्रमण करके उसे जीत लिया । जर्मनी ने ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करने के लिए इराक, ईरान और
सीरिया पर भी आक्रमण किया किन्तु जर्मनी को ब्रिटिश शक्ति के समक्ष पराजित होना पड़ा । इससे अब जर्मनी के लिए पूर्वी रास्ता बन्द हो गया।

जर्मनी का रूस पर आक्रमण-

यद्यपि रूस तथा जर्मनी के बीच अगस्त, 1939 में अनाक्रमण समझौता हो चुका था । किन्तु हिटलर की महत्त्वाकांक्षा के सम्मुख सन्धि तथा समझौतों का कोई औचित्य नहीं था । वह रूस को पराजित कर पूर्वी सीमा के खतरे को समाप्त करना चाहता था । रूसी सेनाओं ने इस्टोनिया, लेटविया और लिथुआनिया पर अधिकार कर लिया परन्तु जर्मनी ने इसका विरोध नहीं किया । किन्तु इसके पश्चात् दोनों देशों ने बाल्कन क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की चेष्टा की, जिससे दोनों देशों के बीच प्रतिद्धन्द्रिता आरम्भ हो गई। अत: 22 जून, 1941 को जर्मन सेना ने रूस पर आक्रमण कर यूकेन, एस्टोनिया, लेटेविया, लिथुआनिया, फिनलैण्ड और पूर्वी पोलैण्ड पर रूसी सेनाओं को हटा कर अधिकार कर लिया । जर्मन सेनाएं लेनिनग्राड के निकट तक पहुँच गयी । रूस की 5,00,000 वर्ग मील भूमि पर हिटलर का अधिकार हो गया । किन्तु हिटलर अपने प्रमुख लक्ष्य अर्थात् मास्को पर अधिकार करने और रूसी सेना का विनाश करने में असफल रहा ।

जर्मनी के विरुद्ध  खूनी संघर्ष

अपनी विशाल, यन्त्रीकृत एवं कवचित सेनाओं तथा वायुसेना की प्रबल शक्ति का प्रयोग करने के बाद भी जर्मनी, छः माह में सोवियत संघ को समाप्त नहीं कर सका । मास्को पर आक्रमण करके जर्मनी ने भूल की | रूस के प्रत्येक नागरिक ने जर्मनी के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया था । साथ ही शीत ऋतु के आरम्भ होने से जर्मनी का आगे बढ़ना कठिन हो गया | रूसी सेना अध्यक्ष मार्शल झुकोव के प्रत्याक्रमण के फलस्वरूप जर्मन सेना को मास्को के निकटवर्ती क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा। इस प्रकार जर्मनी का प्रमुख लक्ष्य मास्को पर अधिकार पूरा न हो सका किन्तु उसे रूस की 5 लाख वर्ग मील भूमि प्राप्त हो गयी।

जापान का अमेरिका पर आक्रमण-

जापान पहले से ही एशिया और प्रशांत महासागर में अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास कर रहा था । आरम्भ में उसे कुछ सफलता भी प्राप्त हुई थी । जर्मनी के साथ मिलकर जापान ने रोम-बर्लिन–ोकियो धुरी का निर्माण किया था । जर्मनी चाहता था कि जापान उसके साथ युद्ध में सम्मिलित हो । फ्रांस के पतन से लाभ उठाकर जापान ने फ्रेंच इण्डो चीन में सैनिक एवं नाविक अड्डे प्राप्त कर शीघ्र ही उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया । डच ईस्ट इण्डीज की ओर भी उसका रुख आक्रामक था । जापान की इस गतिविधि से इंगलैण्ड तथा अमेरिका चौकन्ने हो गये । अमेरिका ने जापान को चेतावनी दी कि यदि इन द्वीपों में हस्तक्षेप किया गया, तो प्रशांत महासागर की शान्ति के लिये संकट उत्पन्न हो सकता है । इसका उत्तर जापान ने जर्मनी तथा इटली से सितम्बर, 1940 में एक सैनिक सन्धि करके दिया । उसने देखा कि ख्स हार रहा है, इंग्लैण्ड एकाकी एवं निर्बल है और संयुक्त राज्य युद्ध के लिये तैयार नहीं है |

प्रशांत महासागर में अपने एकमात्र बचे हुए प्रतिद्वन्दी संयुक्त राज्य को चुनौती देने का उसे यही सुअवसर दिखाई दिया और 7 दिसम्बर, 1941 को युद्ध की घोषणा किये बिना, अचानक प्रशांत महासागर में हवाई द्वीप समूह में स्थित पर्ल हार्बर पर हवाई जहाजों तथा पनडुब्बियों से आक्रमण करके उसका बहुत बड़ा भाग नष्ट कर दिया | इस आक्रमण के फलस्वरूप 19 नौसैनिक जहाज, जिनमें 8 बड़े जंगी जहाज भी सम्मिलित थे, डुबा दिये गए अथवा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गये, 177 विमान नष्ट हो गए, 2343 सैनिक मारे गये और 2,000 से अधिक घायल हुए 119 संयुक्त राज्य को इससे बड़ी हार कभी नहीं खानी पड़ी थी। इस घटना के दूसरे दिन 8 दिसम्बर को अमेरिका और इंग्लैण्ड ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी ।

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