शिक्षा की संकुचित अवधारण स्पष्ट कीजिए

शिक्षा की संकुचित अवधारण स्पष्ट कीजिए

शिक्षा की प्रकृति

(1) शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है :- व्यापक व संकुचित दोनों ही अर्थों में शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है । मनुष्य की पूरी समस्या एवं संस्कृति का विकास उसके सामाजिक पर्यावरण में ही होता है । शिक्षा अनवरत प्रक्रिया है :- जन्म से मरण तक एक-दूसरे के सम्पर्क में आते रहते हैं। और सदैव नये-नये अनुभव प्राप्त करते रहते हैं । समाज के सदस्य तो समाप्त होते रहते हैं लेकिन उनकी शिक्षा की प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है । शिक्षा वि-ध्रुवीय प्रक्रिया है :- शिक्षा की प्रक्रिया सदैव दो के बीच चलती रहती है एक प्रभावित होने वाला दूसरा प्रभावित करने वाला ।

(4) शिक्षा त्रिमुखी प्रक्रिया है (Tri-polar) – जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा के 3 मुख है
Education
शिक्षक
समाज
शिक्षार्थी

Curriculum शिक्षा की सफलता में इन तीनों मुखों का विशेष महत्व है ।। शिक्षा विकास की प्रक्रिया है- मनुष्य जन्म से कुछ गुणों को लेकर पैदा होता है उसका जन्मजात व्यवहार पशुवत होता है, सामाजिक पर्यावरण में उसके इस व्यवहार में परिवर्तन होता है । मनुष्य अपने अनुभवों को भाषा के माध्यम से सुरक्षित रखता है । तथा उसे आने वाली पीढ़ी को सौंप देता है । आने वाली पीढ़ी इस ज्ञान के आधार पर आगे बढ़ती है । तथा इसमें अपने अनुभव और जोड़ देती है । इस प्रकार समाज की सभ्यता एवं संस्कृति का विकास होता रहता है । यही शिक्षा विकास की प्रक्रिया कहलाती है ।

(6) शिक्षा गतिशील प्रक्रिया है :-

शिक्षा के दवारा मनुष्य अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में निरन्तर विकास करता है । इस विकास के लिये उसकी एक पीढ़ी अपने ज्ञान, कला एवं कौशल आदि की दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करती है । परन्तु जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन होते हैं जैसे-तैसे शिक्षा उन परिवर्तनों को स्वीकार करती हुई आगे बढ़ती है । इस तरह शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यचर्चा आदि में आवश्यकतानुसार परिवर्तन होते रहते हैं । यही उसकी गतिशीलता कहलाती है । यदि शिक्षा में गतिशीलता न होती तो हम प्रगति न कर पाते ।

शिक्षा: कला अथवा विज्ञान?

शिक्षा कला है या विज्ञान? इससे पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि कला एवं विज्ञान किसे कहते हैं? कला का प्रयोजन है – “कुछ करना या प्रभावन डालना” अर्थात् कला के माध्यम से मानवीय प्रक्रियाओं का रूपान्तरण किया जाता है । जबकि विज्ञान का अर्थ ” विशिष्ट ज्ञान अर्थात् सत्य का धारणा ।” विज्ञान वर्गीकृत सिद्धान्त और निरीक्षण व परीक्षण करने योग्य ज्ञान का समाहार है जो तार्किक क्रम में व्यवस्थित किया जाता है | कला एवं विज्ञान की इन व्याख्याओं के संदर्भ में शिक्षा की प्रकृति का निर्धारण किया जाना चाहिए ।

व्यापक संदर्भ में शिक्षा के सम्प्रत्यय की विवेचना कीजिए

यदि हम शिक्षा की विषय-वस्तु, स्वरूप, विधि तथा उद्देश्यों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि शिक्षा न केवल कला है और न केवल विज्ञान है | अपितु वह कला तथा विज्ञान दोनों ही है। कला का अर्थ एक आदर्श प्रस्तुत करना है । कला हमें बताती है कि अभीष्ट क्या है, उद्देश्य तथा गन्तव्य क्या है | इस रूप में शिक्षा भी हमारे सम्मुख अनेक आदर्श प्रस्तुत करती है, अनेक उद्देश्य निश्चित करती है तथा गन्तव्य का निर्धारण करती है । उदाहरण के लिए चरित्र निर्माण करना राष्ट्रीय भावना का विकास करना, व्यक्तित्व का सर्वांगीण तथा सन्तुलित विकास करना जैसे शिक्षा के अनेक उद्देश्य तथा आदर्श है जिनको शिक्षा के माध्यम से प्राप्त करने के प्रयास किये जाते हैं । इस प्रकृति के कारण शिक्षा कला है ।

शिक्षा विज्ञान भी है । विज्ञान हमें दक्षता पूर्वक कार्य करने की विधि से अवगत कराता है । यह ज्ञान को पूर्व नियोजित, संगठित तथा मितव्ययिता पूर्वक प्राप्त करने की प्रविधियों से अवगत कराता है । शिक्षा में अनेक प्रयास इस प्रकार किये जाते हैं कि व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास पूर्व नियोजित संगठित, मितव्ययिता पूर्वक व सफलतापूर्वक हो सकें । इसके लिए शिक्षा ने विविध प्रविधियों का विकास भी कर लिया है, विभिन्न शिक्षा सिद्धान्तों का विकास किया है, शिक्षण विधियों, उद्देश्यों का वर्गीकरण, श्रव्य-दृश्य उपकरणों का निर्माण मूल्यांकन प्रविधियों तथा विद्यालय संगठन के सिद्धान्तों का विकास किया है । यह सभी शिक्षा को मापन योग्य वस्तुनिष्ठता तथा प्रभावशीलता प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है । यह कार्य केवल विज्ञान ही कर सकता है । अतः कहा जा सकता है कि शिक्षा विज्ञान भी है । अन्त में हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा कला तथा विज्ञान दोनों ही है | इसे केवल कला अथवा केवल विज्ञान कहना उचित न होगा ।

स्वमूल्यांकन प्रश्न

“शिक्षा विज्ञान भी है कला भी । ” इस कथन की पुष्टि अपने तर्को द्वारा कीजिए।

शिक्षा के आधार

शिक्षा की प्रमुख चार आधार शिलाएँ हैं :मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, सामाजिक, वैज्ञानिक

शिक्षा के मनोवैज्ञानिक आधार

मनोवैज्ञानिक आधार इतना विशद है कि शिक्षा विधि के क्षेत्र में उसकी देन अपरिमित है । इसमें वैयक्तिक भिन्नता पर आज विशेष ध्यान दिया जाता है । मनोविज्ञान शिक्षा में बालक को केन्द्र बिन्दु मानता है । 19वीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक विचारधारा ने शिक्षा को अधिक प्रभावित किया है । शिक्षा की व्यवस्था का आधार बालकों की रूचियों एवं आवश्यकताओं को माना है ।

शिक्षा के दार्शनिक आधार

दार्शनिक शिक्षा के दो पक्ष हैं :

(i) सैद्धान्तिक पक्ष (ii) व्यावहारिक पक्ष

शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष दर्शन पर आधारित है और दर्शन का सम्बन्ध जीवन से है । जीवन यापन के ढंग को दर्शन कहते हैं । दर्शन का अवलम्बन लिये बिना उद्देश्यों का निर्धारण असम्भव होगा । शिक्षा सोद्देश्य होती है तथा विभिन्न दर्शन उसके उद्देश्यों का निर्धारण करते हैं।

 शिक्षा का सामाजिक आधार

बालक जीवन भर किसी न किसी समाज का सदस्य रहता है । स्कूल भी समाज का लघुरूप है । और शिक्षा का उच्चतम उद्देश्य व्यक्ति को समाज का श्रेष्ठ सदस्य बनाना है । शिक्षा कहीं भी हो कभी भी हो तथा किसी भी दशा में हो, एक ही प्रमुख उद्देश्य को लेकर चलेगी और वह है – बालक का विकास और बालक का विकास भी कैसा – सर्वांगीण । अब प्रमुख बात यह है कि बालक का विकास सदैव ही वि-पक्षीय (bi-polar) होता है ।
बालक का विकास
वैयक्तिक दृष्टिकोण (Individual Apporach)
सामाजिक दृष्टिकोण (Social Apporach)
जीव शास्त्रीय
मनोवैज्ञानिक (Biological Heridity) (Psychological Environment) (बुद्धि-विवेक) (जो प्राप्त है)

(i) वैयक्तिक दृष्टिकोण – बालक के वैयक्तिक विकास में जीव शास्त्र का यथेष्ट योग रहता है । क्योंकि बालक के व्यवहार में जैविकीय तत्वों का सीधा प्रभाव रहता है ।

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