साम्यवादी विचारधारा के विपरीत मित्र राष्ट्रों की एकजुटता

साम्यवादी विचारधारा के विपरीत मित्र राष्ट्रों की एकजुटता

यही कारण है कि विश्व युद्ध के बाद यूरोप में यह प्रवृत्ति पैदा हुई कि साम्यवादी विचारधारा के अनुयायी पूर्वी यूरोप के राज्य रूस की संरक्षा में अपना संगठन बना ले | इसी प्रकार लोकतंत्र के अनुयायी पश्चिमी यूरोप के राज्यों ने आवश्यकता महसूस की कि वे साम्यवाद से बचने के लिए संगठित हो जाय ।

3. सर्वसत्तावादी शासन की स्थापना पर बल-

यद्यपि विश्व युद्ध में प्रजातंत्रीय व्यवस्था ने अपनी विजय स्थापित कर ली थी परन्तु वास्तव में इस युद्ध ने प्रजातंत्रीय राज्यों को निर्बल तथा खोखला साबित कर दिया था । फ्रांस तथा ब्रिटेन विजयी होते हुए भी युद्ध के पश्चात् अपने को आर्थिक संकट से नहीं बचा सके थे। अतः यूरोप के देशों में अब लोकतन्त्र का स्थान सर्वसत्तावादी शासन (Totalitarianism) लेने लगा था | विविध विचारधाराओं के कारण राष्ट्रीय सरकारों की स्थिति अब कहीं भी सुरक्षित नहीं थी क्योंकि प्रायः प्रत्येक देश में ऐसी राजनीतिक पार्टियां स्थापित हो गयी थी, जो राज्य की सुरक्षा की अपेक्षा किसी विचारधारा को अधिक महत्व देती थी, अतः राष्ट्रीय सरकारों के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वे इन राजनीतिक दलों पर अनेक प्रकार की पाबन्दियाँ लगायें और अपने हाथों में इतने अधिकार रखें जिससे इन राष्ट्र विरोधी शक्तियों का भली-भांति दमन किया जा सके । यही कारण है कि ब्रिटेन जैसे स्वतन्त्रता प्रिय देश को भी कम्युनिस्ट पार्टी के विरुद्ध अनेक कार्यवाहियां करने की आवश्यकता महसूस हुई । अतः अब विचार स्वातन्त्र्य और सच्चे लोकशासन का लोप होने लगा।

4. यूरोपीय प्रभुत्व का अन्त-

द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व तक यूरोप, विश्व इतिहास का निर्माता था किन्तु इस युद्ध के बाद यूरोप के राष्ट्र आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से अपाहिज हो चुके थे । विश्व समाज को अनुशासित करने वाला यूरोप अब ‘समस्या प्रधान यूरोप बन गया । विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पूर्णतः पंगु हो चुका था, इटली सर्वनाश के कगार पर खड़ा था तथा ब्रिटेन तथा फ्रांस की स्थिति तृतीय श्रेणी के राष्ट्रों जैसी हो गयी थी । आर्थिक दृष्टि से पंगु इन देशों में भोजन, वस्त्र तथा ईंधन की अत्यन्त कमी हो गयी थी और लाखों लोग बेघरबार तथा बेरोजगार हो गये थे । यह समस्या इतनी विकट थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भागीरथ प्रयत्नों के उपरान्त युद्ध समाप्ति के दस वर्ष बाद भी यूरोप में कोई 20 लाख बेघरबार व्यक्ति मौजद थे। परिणामस्वरूप विश्व का नेतृत्व दो महाशक्तियों-संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस के हाथ में चला गया । विश्व के छोटे-छोटे राष्ट्र तेजी से उनके प्रभाव क्षेत्रों में बँटने लगे। इस प्रकार विश्व राजनीति का नेतृत्व अब यूरोप के हाथों से निकल कर इन दा महाशक्तियों के हाथों में चला गया था। रूस साम्यवादी विचारधारा का पोषक बन गया और अमेरिका लोकतन्त्र एवं पूँजीवादी आकांक्षाओं के लिए सहारा बन गया।

5. शीत युद्ध का आरम्भ-

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व के राजनीतिज्ञों व नागरिकों को यह आशा थी कि संसार में अब दीर्घकालीन शान्ति स्थापित हो जायेगी और विजयी मित्र राष्ट्र युद्धकालीन मित्रता एवं सहयोग को बनाये रखकर युद्धोत्तरकालीन जटिल समस्याओं को भी आपसी सूझबूझ से सुलझा लेंगे । किन्तु लोगों की यह आशा फलीभूत न हो सकी । युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर रूस और अमेरिका जैसी दो महाशक्तियों का उदय हुआ। ये दोनों देश दो अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते.थे । अतः दोनों देशों के बीच विभिन्न समस्याओं के सम्बन्ध में शीघ्र ही तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गया। इन मतभेदों ने इतना तनाव और वैमनस्य उत्पन्न कर दिया कि सशस्त्र संघर्ष के न होते हुए भी दोनों के बीच आरोपों, प्रत्यारोपों एवं परसर विरोधी राजनैतिक प्रचार का तुमुल युद्ध आरम्भ हो गया जो अनेक वर्षों तक चलता रहा । यही शीतयुद्ध कहलाता है । इस प्रकार परस्पर विरोधी राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक सम्बन्ध तो बने रहे और कोई प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं हुआ, किन्तु उनका पारस्परिक व्यवहार शत्रुतापूर्ण बना रहा । परस्पर विरोधी देशों में समाचार पत्रों के माध्यम से आरोप-प्रत्यारोप लगाये जाते रहते हैं।

6. प्रादेशिक संगठनों का विकास-

संयुक्त राष्ट्र संघ भी अमेरिका और रूस के बीच चलने वाले शीतयुद्ध का अखाड़ा बन गया । परिणामस्वरूप दोनों पक्ष अपनी भावी सुरक्षा के लिए प्रादेशिक संगठनों के निर्माण की ओर अग्रसर हुए। कुछ देशों ने साम्यवाद के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से अमेरिका के नेतृत्व में संगठित हुए, तो दूसरी ओर रूस ने अपने और पश्चिमी राष्ट्रों के बीच साम्यवादी सरकारों की स्थापना करके सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न किया। पश्चिमी राष्ट्रों के सुरक्षा संगठनों में, उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन (NATO),दक्षिणी पूर्वी एशिया सन्धि संगठन (SEATO), बगदाद पेक्ट उल्लेखनीय है | पामर एवं परिकन्स के मतानुसार ‘नाटो एक युगान्तरकारी घटना थी। साम्यवादी सुरक्षा संगठनों में “वारसा पक्ट’ प्रमुख है।

7. नये स्वतन्त्र राज्यों का उदय-

युद्ध के पश्चात् यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में राष्ट्रीयता की भावनाएँ प्रज्ज्वलित हुईं। एशिया और अफ्रीका के राष्ट्रीय जागरण ने यूरोपीय राष्ट्रों के प्रभाव को भी समाप्त कर दिया । परिस्थितियों से विवश होकर महायुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीति में परिवर्तन किया जिससे भारत, वर्मा, मलाया, लंका, मिस आदि विविध देश ब्रिटेन के आधिपत्य से मुक्त हो गये। फ्रेंच हिन्द चीन में फ्रांसीसी आधिपत्य के अनेक देशों को भी स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम आदि देश स्वतन्त्र हो गये । हालैण्ड के उपनिवेशोंजावा, सुमात्रा, बोर्निया आदि ने हिन्देशिया नामक संघ राज्य की स्थापना की और हॉलैण्ड से स्वतन्त्र हो गये । इस प्रकार, युद्ध के बाद के वर्षों में धीरे-धीरे यूरोप के औपनिवेशिक साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया । वस्तुतः 1919 के बाद से ही एशिया और अफ्रीका में यूरोपीय साम्राज्यवाद के विरुद्ध जो आन्दोलन उठा था उसको दूसरे महायुद्ध के बाद शानदार सफलता मिली और यूरोपीय साम्राज्य का पतन हो गया।

8. संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना-

प्रत्येक युद्ध के पश्चात् लोगों में शान्ति स्थापित करने का विचार उत्पन्न होता है । अतः प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् शान्ति स्थापित करने के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना की गई थी। इसी तरह द्वितीय विश्व युद्ध के भीषण ताण्डव ने विचारशील राजनीतिज्ञों को मानव जाति की रक्षा के लिए शान्ति को सुरक्षित बनाये रखने वाले एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के निर्माण की तीव्र आवश्यकता महसूस करायी । युद्ध काल में ही इसकी स्थापना के प्रयत्न आरम्भ हो चुके थे ।

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