जापान का सैनिक अभियान (दिसम्बर 1941-मई 1942)-

तीन दिन बाद जर्मनी तथा इटली ने संयुक्त राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और इस प्रकार युद्ध ने एक वास्तविक विश्व युद्ध का रूप धारण कर लिया।

जापान का सैनिक अभियान (दिसम्बर 1941-मई 1942)-

जापान बहुत पहले से ही युद्ध की तैयारी कर रहा था और जर्मनी की तरह उसे भी आरम्भ में बड़ी सफलता प्राप्त हुई। पर्ल हार्बर पर आक्रमण करने के बाद वह दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा प्रशान्त महासागर में यूरोपीय साम्राज्य तथा अमेरिकी द्वीपों की ओर तीव्र गति से बढ़ा और दिसम्बर, 1941 के अन्त तक उसने स्याम पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों से हांगकांग और अमेरिका से ग्वाम तथा वेक आइलैण्ड नामक द्वीप एवं अड्डे छीन लिये और जनवरी, 1942 में फिलिपीन द्वीप समूह के अधिकांश क्षेत्र पर अधिकार कर लिया । फरवरी के मध्य तक मलाया प्रायद्वीप में स्थित इंगलैण्ड का नाविक अड्डा, सिंगापुर भी जापान के अधिकार में चला गया। मार्च के अन्त तक उसने बर्मा विजय करके चीन को युद्ध सामग्री भेजने वाले मार्ग बन्द कर दिये । मार्च में ही उसने हॉलैण्ड, अमेरिका, इंगलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया के सम्मिलित बेड़े को परास्त कर जावा में अपनी सेना भेजी और कुछ सप्ताह में ही समस्त डच ईस्ट इण्डीज पर अधिकार करके आस्ट्रेलिया तक बढ़ गया । मई, 1942 में जापान ने फिलिपीन्स में बचे हुए अड्डे, वटान और कोरेगिडार भी छीन लिए । इस प्रकार 6 साम्राज्य नष्ट कर दिया । माह के भीतर उसने पूर्वी एशिया तथा प्रशान्त महासागर से यूरोपीय तथा अमरीकी सेना को युद्ध के लिए तैयार कर लिया।

रूसी मोर्चा-

रूस में जर्मन सेनाएँ काफी संघर्ष के पश्चात् भी आगे नहीं बढ़ सकी। 1941 की शीत ऋतु में रूसियों ने आक्रमण कर जर्मन सेनाओं को पीछे हटाने में सफलता प्राप्त की । जर्मन सेनाएँ मास्को पर अधिकार तो नहीं कर सकी तथापि उन्होंने शीघ्र ही कीमिया को रौद डाला और सेवेस्टोपोल पर अधिकार कर लिया । ग्रीष्म ऋतु में एक जर्मन सेना तो दक्षिण में काकेशस प्रदेश की और बढ़ी, जिसने उसके समृद्ध तेल प्रदेश पर अधिकार कर लिया तथा दूसरी सेना पूर्व की ओर वोल्गा नदी पर स्थित स्टालिनग्राड की दिशा में बढ़ी, जहाँ वह अगस्त के अन्त में पहुँची । इस प्रकार मार्च, 1942 तक जर्मन सेनाएँ समस्त पश्चिमी प्रदेश पर, दक्षिण में यूक्रेन और क्रीमिया पर तथा पूर्व में काकेशस प्रदेश के भीतर तक अधिकार कर चुकी थी । पूर्ण सफलता अब तीन मुख्य स्थानों लेनिनग्राड, मास्को तथा स्टालिनग्राड पर अधिकार हो जाने पर निर्भर थी किन्तु रूसी लोग इन स्थानों की प्राणप्रण से रक्षा करने में लगे हुए थे। किन्तु अगस्त-सितम्बर में स्टालिन ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन किया और रूसी सेनाओं एवं नागरिकों को नये उत्साह से शत्रु को रोकने की प्रेरणा दी । चर्चिल ने अगस्त, 1942 में रूस जाकर स्टालिन को भी मित्र राष्ट्रों की योजना समझायी और उसकी स्वीकृति प्राप्त कर ली | 19 नवम्बर, 1942 को रूसी सेनाओं ने जर्मनों के विरुद्ध प्रबल प्रत्याक्रमण बारम्भ कर दिया और तीव्र गति से आगे बढ़कर, पाँच दिन में बोल्गा और डान नदियों के बीच 22 जर्मन डिवीजनों को घेर लिया । इससे जर्मनी की सैनिक शक्ति तथा हिटलर की प्रतिष्ठा को गम्भीर आघात पहुँचा । इसके पश्चात् रूस पर अधिकार करने की आशा सदा के लिए समाप्त हो गई।

मापुर का नया मोड़-

अफीका न यूरोप में पुरी राष्ट्रों की पराजय 1942 के पूर्वार्ध तक यूरोप, अफ्रीका और पूर्वी एशिया में पुरी राष्ट्रों का विजय अभियान सफलतापूर्वक चला और बिटेन, अमेरिका तथा रूस को सभी स्थानों पर पीछे हटना पड़ा। किन्तु 1942 के अन्त में धुरी राष्ट्रों की प्रगति रुक गयी । नवम्बर, 1942 में ब्रिटेन व अमेरिका की सेनाओं ने संयुक्त रूप से उत्तरी अफ्रीका से जर्मन और इटालियन सेनाओं को खवेदना आरम्भ कर दिया और अन्त में उत्तरी अफीका पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार हो गया । इस विजय में जनरल मोटगुमरी और आइजनहावर ने प्रमुख योग्यता का परिचय दिया।

इटली की पराजय-

1949 में मित्र राष्ट्रों की स्थिति में सुधार हुआ । 10 जुलाई, 1949 को मित्र राष्ट्रों ने सिसली पर आक्रमण किया । इटली की सेनाएँ काफी कमजोर भी, उन्हें प्रत्येक स्थान पर हारना पड़ा । मुसोलिनी ने हिटलर से सहायता मांगी किन्तु इस समय जर्मन सेना रूस में पराजित हो रही थी, अतः हिटलर कोई सहायता नहीं भेज सका । इस समय इटली का जनमत मुसोलिनी के विरुद्ध हो रहा था। 18 जुलाई को मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेना ने इटली पर आक्रमण किया। भयंकर संघर्ष के बाद 23 जुलाई को मुसोलिनी को गिरफ्तार कर लिया। फासिस्टवाद गैर कानूनी घोषत किया गया और वहाँ नयी सरकार स्थापित की गई। 3 दिसम्बर, 1943 को इटली ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस बीच जर्मन छाताधारी सैनिकों ने मुसोलिनी को कैद से छुड़ा लिया । मुसोलिनी ने जर्मनी की सहायता से पुनः इटली को अपने प्रभाव में लाने का प्रयास किया किन्तु असफल रहा । अन्ततः 4 जून, 1944 को रोम पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार हो गया।

जर्मनी की पराजय –

जर्मनी की पराजय स्टालिनग्राड से आरम्भ हुई। रूसी सेना ने जर्मन सेना को चारों ओर से घेर लिया। फरवरी, 1943 तक एक लाख से अधिक जर्मन सैनिक मारे गये । इससे रूस में एक नई स्फूर्ति पैदा हुई। मास्को का खतरा टल गया था । ग्रीष्म काल में रूस ने जर्मन सेना को पराजित किया। रूस के इतिहास में यह एक बड़ी घटना मानी जाती है। रूस में इस युद्ध को इतिहास का सबसे महान् युद्ध कहा गया है । लगभग दो माह के संघर्ष में 1 लाख 80 हजार जर्मन सैनिक मारे गये । जर्मनी के करीब 9500 हवाई जहाज नष्ट हो गये। 20 हजार सैनिक वाहन एवं अन्य शस्त्रास्व नष्ट हो गये और 1300 टक नष्ट हो गये। रूसी सेनाएँ अब पोलैण्ड पहुँची, वहाँ नात्सी सेना को नष्ट कर दिया और रूमानिया, फिनलैण्ड, बल्गेरिया को जीता | अन्त में 8 मार्च, 1944 को दो हजार अमेरिकन बमवर्थकों ने बर्सिन पर बमबारी की । फ्रांस के उत्तरी पश्चिमी समुह के किनारे मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ उतारी गई। दिसम्बर, 1944 तक तीन लाच सेना फास पहुच गई। मांस की सीमा पर जर्मन किलेबन्दी को मस्त कर दिया ।

15 अगस्त, 1944 को फ्रांस के पूर्वी भूमध्य सागरीय तट पर मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ उतारी गईं, जिन्होंने तुलो और मारसेली के बन्दरगाहों पर अधिकार कर लिया ।

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